लंका काण्ड दोहा 25
चौपाई : :सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला॥जान उमापति जासु सुराई। पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई॥1॥ भावार्थ:-(रावण ने कहा-) अरे मूर्ख! सुन, मैं वही बलवान् रावण हूँ, जिसकी भुजाओं की लीला (करामात) कैलास पर्वत जानता है।…
चौपाई : :सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला॥जान उमापति जासु सुराई। पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई॥1॥ भावार्थ:-(रावण ने कहा-) अरे मूर्ख! सुन, मैं वही बलवान् रावण हूँ, जिसकी भुजाओं की लीला (करामात) कैलास पर्वत जानता है।…
चौपाई :धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा॥नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई॥1॥ भावार्थ:- बंदर को धन्य है, जो अपने मालिक के लिए लाज छोड़कर जहाँ-तहाँ नाचता है। नाच-कूदकर, लोगों को रिझाकर,…
चौपाई :तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद॥तब प्रभु नारि बिरहँ बलहीना। अनुज तासु दुख दुखी मलीना॥1॥ भावार्थ:- अरे अंगद! सुन, तेरी सेना में बता, ऐसा कौन योद्धा है, जो मुझसे भिड़ सकेगा। तेरा मालिक तो…
चौपाई :सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई॥तासु दूत होइ हम कुल बोरा। अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा॥1॥ भावार्थ:- शिव, ब्रह्मा (आदि) देवता और मुनियों के समुदाय जिनके चरणों की सेवा (करना) चाहते हैं, उनका दूत होकर…
चौपाई :रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी॥कहु निज नाम जनक कर भाई। केहि नातें मानिऐ मिताई॥1॥ भावार्थ:- (रावण ने कहा-) अरे बंदर के बच्चे! सँभालकर बोल! मूर्ख! मुझ देवताओं के शत्रु को तूने जाना नहीं? अरे भाई!…
चौपाई :कह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर॥मम जनकहि तोहि रही मिताई। तव हित कारन आयउँ भाई॥1॥ भावार्थ:- रावण ने कहा- अरे बंदर! तू कौन है? (अंगद ने कहा-) हे दशग्रीव! मैं श्री रघुवीर का दूत हूँ। मेरे…
चौपाई :तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा॥सुनत बिहँसि बोला दससीसा। आनहु बोलि कहाँ कर कीसा॥1॥ भावार्थ:- तुरंत ही उन्होंने एक राक्षस को भेजा और रावण को अपने आने का समाचार सूचित किया। सुनते ही रावण हँसकर बोला- बुला लाओ,…
चौपाई :बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई॥प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका॥1॥ भावार्थ:- चरणों की वंदना करके और भगवान् की प्रभुता हृदय में धरकर अंगद सबको सिर नवाकर चले। प्रभु के प्रताप को…
चौपाई :इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई॥कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सिरु नाई॥1॥ भावार्थ:- यहाँ (सुबेल पर्वत पर) प्रातःकाल श्री रघुनाथजी जागे और उन्होंने सब मंत्रियों को बुलाकर सलाह पूछी कि शीघ्र बताइए, अब…
चौपाई :बिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह महिमा बलवाना॥नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं॥1॥ भावार्थ:- पत्नी के वचन कानों से सुनकर रावण खूब हँसा (और बोला-) अहो! मोह (अज्ञान) की महिमा बड़ी बलवान् है। स्त्री…
चौपाई :पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा॥भृकुटि बिलास भयंकर काला। नयन दिवाकर कच घन माला॥1॥ भावार्थ:- पाताल (जिन विश्व रूप भगवान् का) चरण है, ब्रह्म लोक सिर है, अन्य (बीच के सब) लोकों का विश्राम (स्थिति)…
चौपाई :कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा।सोचहिं सब निज हृदय मझारी। असगुन भयउ भयंकर भारी॥1॥ भावार्थ:- न भूकम्प हुआ, न बहुत जोर की हवा (आँधी) चली। न कोई अस्त्र-शस्त्र ही नेत्रों से देखे। (फिर…