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लंका काण्ड दोहा 121

चौपाई :प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई। धरि बटु रूप अवधपुर जाई॥भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु। समाचार लै तुम्ह चलि आएहु॥1॥भावार्थ:-तदनन्तर प्रभु ने हनुमान्‌जी को समझाकर कहा- तुम ब्रह्मचारी का रूप धरकर अवधपुरी को जाओ। भरत को हमारी कुशल सुनाना और उनका समाचार…

30 Jun 2024 • 84 • 4 min read
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लंका काण्ड दोहा 120

चौपाई :तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहँ परम सुहावा॥कुंभजादि मुनिनायक नाना। गए रामु सब कें अस्थाना॥1॥भावार्थ:-विमान शीघ्र ही वहाँ चला आया, जहाँ परम सुंदर दण्डकवन था और अगस्त्य आदि बहुत से मुनिराज रहते थे। श्री रामजी इन सबके…

30 Jun 2024 • 104 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 119

चौपाई :अतिसय प्रीति देखि रघुराई। लीन्हे सकल बिमान चढ़ाई॥मन महुँ बिप्र चरन सिरु नायो। उत्तर दिसिहि बिमान चलायो॥1॥भावार्थ:-श्री रघुनाथजी ने उनका अतिशय प्रेम देखकर सबको विमान पर चढ़ा लिया। तदनन्तर मन ही मन विप्रचरणों में सिर नवाकर उत्तर दिशा की…

30 Jun 2024 • 90 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 118

चौपाई :भालु कपिन्ह पट भूषन पाए। पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए॥नाना जिनस देखि सब कीसा। पुनि पुनि हँसत कोसलाधीसा॥1॥भावार्थ:-भालुओं और वानरों ने कपड़े-गहने पाए और उन्हें पहन-पहनकर वे श्री रघुनाथजी के पास आए। अनेकों जातियों के वानरों को देखकर कोसलपति…

30 Jun 2024 • 100 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 117

चौपाई :सुनत बिभीषन बचन राम के। हरषि गहे पद कृपाधाम के॥बानर भालु सकल हरषाने। गहि प्रभु पद गुन बिमल बखाने॥1॥भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी के वचन सुनते ही विभीषणजी ने हर्षित होकर कृपा के धाम श्री रामजी के चरण पकड़ लिए। सभी वानर-भालू…

30 Jun 2024 • 88 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 116

चौपाई :करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए॥नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी। बिनय सुनहु प्रभु सारँगपानी॥1॥भावार्थ:-जब शिवजी विनती करके चले गए, तब विभीषणजी प्रभु के पास आए और चरणों में सिर नवाकर कोमल वाणी से बोले-…

30 Jun 2024 • 106 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 115

छंदमामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक।।मोह महा घन पटल प्रभंजन। संसय बिपिन अनल सुर रंजन।।1।।भावार्थ:-हे रघुकुल के स्वामी! सुंदर हाथों में श्रेष्ठ धनुष और सुंदर बाण धारण किए हुए आप मेरी रक्षा कीजिए। आप महामोहरूपी मेघसमूह के…

30 Jun 2024 • 97 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 114

चौपाईसुन सुरपति कपि भालु हमारे। परे भूमि निसिचरन्हि जे मारे।।मम हित लागि तजे इन्ह प्राना। सकल जिआउ सुरेस सुजाना।।1।।भावार्थ:-हे देवराज! सुनो, हमारे वानर-भालू, जिन्हें निशाचरों ने मार डाला है, पृथ्वी पर पड़े हैं। इन्होंने मेरे हित के लिए अपने प्राण…

30 Jun 2024 • 96 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 113

छंद –जय राम सोभा धाम। दायक प्रनत बिश्राम।।धृत त्रोन बर सर चाप। भुजदंड प्रबल प्रताप।।1।।भावार्थ:-शोभा के धाम, शरणागत को विश्राम देने वाले, श्रेष्ठ तरकस, धनुष और बाण धारण किए हुए, प्रबल प्रतापी भुज दंडों वाले श्रीरामचंद्रजी की जय हो! ।।1।।…

30 Jun 2024 • 77 • 3 min read
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लंका काण्ड दोहा 112

तेहि अवसर दसरथ तहँ आए। तनय बिलोकि नयन जल छाए।।अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा। आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा।।1 ।।भावार्थ:-उसी समय दशरथजी वहाँ आए। पुत्र (श्रीरामजी) को देखकर उनके नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल छा गया। छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित प्रभु…

30 Jun 2024 • 105 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 111

छंद-जय राम सदा सुख धाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे।।भव बारन दारन सिंह प्रभो। गुन सागर नागर नाथ बिभो॥1॥भावार्थ:-हे नित्य सुखधाम और (दु:खों को हरने वाले) हरि! हे धनुष-बाण धारण किए हुए रघुनाथजी! आपकी जय हो। हे प्रभो! आप भव…

30 Jun 2024 • 97 • 4 min read
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लंका काण्ड दोहा 110

चौपाई :तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई॥आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी॥1॥ भावार्थ:-तब श्री रघुनाथजी की आज्ञा पाकर इंद्र का सारथी मातलि चरणों में सिर नवाकर (रथ लेकर) चला गया। तदनन्तर सदा के स्वार्थी देवता…

12 Aug 2023 • 178 • 2 min read