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लंका काण्ड दोहा 37

चौपाई :जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला॥कारुनीक दिनकर कुल केतू। दूत पठायउ तव हित हेतू॥1॥ भावार्थ:- जिन्होंने खेल से ही समुद्र को बँधा लिया और जो प्रभु सेना सहित सुबेल पर्वत पर उतर पड़े, उन सूर्यकुल के…

28 Apr 2023 • 94 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 36

चौपाई :कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही॥रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई॥1॥ भावार्थ:- हे कान्त! मन में समझकर (विचारकर) कुबुद्धि को छोड़ दो। आप से और श्री रघुनाथजी से युद्ध शोभा नहीं देता।…

28 Apr 2023 • 100 • 3 min read
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लंका काण्ड दोहा 35

चौपाई :कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे॥गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा॥1॥ भावार्थ:- अंगद का बल देखकर सब हृदय में हार गए। तब अंगद के ललकारने पर रावण स्वयं उठा। जब…

28 Apr 2023 • 100 • 3 min read
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लंका काण्ड दोहा 34

चौपाई :मैं तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक॥असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं॥1॥ भावार्थ:- मैं तेरे दाँत तोड़ने में समर्थ हूँ। पर क्या करूँ? श्री रघुनाथजी ने मुझे आज्ञा नहीं दी। ऐसा…

28 Apr 2023 • 87 • 3 min read
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लंका काण्ड दोहा 33

चौपाई :एहि बधि बेगि सुभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु॥मर्कटहीन करहु महि जाई। जिअत धरहु तापस द्वौ भाई॥1॥ भावार्थ:- (रावण फिर बोला-) इसे मारकर सब योद्धा तुरंत दौड़ो और जहाँ कहीं रीछ-वानरों को पाओ, वहीं खा डालो।…

28 Apr 2023 • 89 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 32

चौपाई :जब तेहिं कीन्हि राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा॥हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना॥1॥ भावार्थ:- जब उसने श्री रामजी की निंदा की, तब तो कपिश्रेष्ठ अंगद अत्यंत क्रोधित हुए, क्योंकि (शास्त्र ऐसा कहते हैं…

28 Apr 2023 • 100 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 31

चौपाई :जौं अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई॥कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा॥1॥ भावार्थ:- यदि ऐसा करूँ, तो भी इसमें कोई बड़ाई नहीं है। मरे हुए को मारने में कुछ भी पुरुषत्व (बहादुरी)…

28 Apr 2023 • 100 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 30

चौपाई :अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही॥दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीर पठायउँ॥1॥ भावार्थ:- अरे दुष्ट! अब बतबढ़ाव मत कर, मेरा वचन सुन और अभिमान त्याग दे! हे दशमुख! मैं दूत की तरह (सन्धि…

28 Apr 2023 • 94 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 29

चौपाई :जरत बिलोकेउँ जबहि कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला॥नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची॥1॥ भावार्थ:- मस्तकों के जलते समय जब मैंने अपने ललाटों पर लिखे हुए विधाता के अक्षर देखे, तब मनुष्य के…

28 Apr 2023 • 91 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 28

चौपाई :सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई॥नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा॥1॥ भावार्थ:- रे दुष्ट! वानरों की सहायता जोड़कर राम ने समुद्र बाँध लिया, बस, यही उसकी प्रभुता है। समुद्र को तो अनेकों…

28 Apr 2023 • 105 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 27

चौपाई :सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई॥जौं खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही॥1॥ भावार्थ:- अरे रावण! चतुराई (कपट) छोड़कर सुन। कृपा के समुद्र श्री रघुनाथजी का तू भजन क्यों नहीं करता? अरे दुष्ट!…

28 Apr 2023 • 145 • 2 min read
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लंका काण्ड दोहा 26

चौपाई :सुनि अंगद सकोप कह बानी। बोलु संभारि अधम अभिमानी॥सहसबाहु भुज गहन अपारा। दहन अनल सम जासु कुठारा॥1॥ भावार्थ:- रावण के ये वचन सुनकर अंगद क्रोध सहित वचन बोले- अरे नीच अभिमानी! सँभलकर (सोच-समझकर) बोल। जिनका फरसा सहस्रबाहु की भुजाओं…

28 Apr 2023 • 97 • 2 min read