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बालकांड दोहा 361

चौपाई :बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी॥सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ॥1॥ भावार्थ:- वामदेवजी और रघुकुल के गुरु ज्ञानी वशिष्ठजी ने फिर विश्वामित्रजी की कथा बखानकर कही। मुनि का सुंदर यश सुनकर राजा मन…

12 Mar 2023 • 214 • 2 min read
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बालकांड दोहा 360

चौपाई :सुदिन सोधि कल कंकन छोरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे॥नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं॥1॥ भावार्थ:- अच्छा दिन (शुभ मुहूर्त) शोधकर सुंदर कंकण खोले गए। मंगल, आनंद और विनोद कुछ कम नहीं हुए (अर्थात…

12 Mar 2023 • 197 • 2 min read
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बालकांड दोहा 359

चौपाई :भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठे हरषि रजायसु पाई॥देखि रामु सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी॥1॥ भावार्थ:- राजा ने देखते ही उन्हें हृदय से लगा लिया। तदनन्तर वे आज्ञा पाकर हर्षित होकर बैठ गए। श्री रामचन्द्रजी के दर्शन…

12 Mar 2023 • 174 • 2 min read
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बालकांड दोहा 358

चौपाई :नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना॥घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं॥1॥ भावार्थ:- नींद में भी उनका अत्यन्त सलोना मुखड़ा ऐसा सोह रहा था, मानो संध्या के समय का लाल कमल सोह रहा हो।…

12 Mar 2023 • 172 • 2 min read
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बालकांड दोहा 357

चौपाई :मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी॥मख रखवारी करि दुहुँ भाईं। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाईं॥1॥ भावार्थ:- हे तात! मैं बलैया लेती हूँ, मुनि की कृपा से ही ईश्वर ने तुम्हारी बहुत सी बलाओं को टाल दिया।…

12 Mar 2023 • 186 • 2 min read
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बालकांड दोहा 356

चौपाई :भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए॥सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना॥1॥ भावार्थ:- राजा के स्वाभव से ही सुंदर वचन सुनकर (रानियों ने) मणियों से जड़े सुवर्ण के पलँग बिछवाए। (गद्दों पर) गो…

12 Mar 2023 • 179 • 2 min read
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बालकांड दोहा 355

चौपाई :मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि॥अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्रग सुगंध भूषित छबि छाए॥1॥ भावार्थ:- सुंदर स्त्रियाँ मंगलगान कर रही हैं। वह रात्रि सुख की मूल और मनोहारिणी हो गई। सबने आचमन करके पान खाए और…

12 Mar 2023 • 212 • 2 min read
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बालकांड दोहा 354

चौपाई :सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू॥जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे॥1॥ भावार्थ:- सब प्रकार से सबका प्रेमपूर्वक भली-भाँति आदर-सत्कार कर लेने पर राजा दशरथजी के हृदय में पूर्ण उत्साह (आनंद) भर गया।…

12 Mar 2023 • 186 • 2 min read
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बालकांड दोहा 353

चौपाई :बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें॥नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा॥1॥ भावार्थ:- राजा ने अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदय से पुत्रों को और सारी सम्पत्ति को सामने रखकर (उन्हें स्वीकार करने के लिए) विनती की,…

12 Mar 2023 • 184 • 2 min read
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बालकांड दोहा 352

चौपाई :जो बसिष्ट अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही॥भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठीं भाग्य बड़ जानी॥1॥ भावार्थ:- वशिष्ठजी ने जो आज्ञा दी, उसे लोक और वेद की विधि के अनुसार राजा ने आदरपूर्वक किया। ब्राह्मणों की भीड़…

12 Mar 2023 • 188 • 2 min read
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बालकांड दोहा 351

चौपाई :देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की॥सबहि बंदि माँगहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना॥1॥ भावार्थ:- मन की सभी वासनाएँ पूरी हुई जानकर देवता और पितरों का भलीभाँति पूजन किया। सबकी वंदना करके माताएँ यही वरदान माँगती…

12 Mar 2023 • 185 • 2 min read
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बालकांड दोहा 350

चौपाई :चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए॥तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनीत पखारे॥1॥ भावार्थ:- स्वाभाविक ही सुंदर चार सिंहासन थे, जो मानो कामदेव ने ही अपने हाथ से बनाए थे। उन पर माताओं ने राजकुमारियों…

12 Mar 2023 • 224 • 2 min read