बालकांड दोहा 325
चौपाई :कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं। नयन लाभु सब सादर लेहीं॥जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी॥1॥ भावार्थ:- वर और कन्या सुंदर भाँवरें दे रहे हैं। सब लोग आदरपूर्वक (उन्हें देखकर) नेत्रों का परम लाभ ले…
चौपाई :कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं। नयन लाभु सब सादर लेहीं॥जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी॥1॥ भावार्थ:- वर और कन्या सुंदर भाँवरें दे रहे हैं। सब लोग आदरपूर्वक (उन्हें देखकर) नेत्रों का परम लाभ ले…
चौपाई :जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी॥॥सुजसु सुकृत सुख सुंदरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई॥1॥ भावार्थ:- जनकजी की जगविख्यात पटरानी और सीताजी की माता का बखान तो हो ही कैसे सकता है। सुयश, सुकृत (पुण्य), सुख और…
चौपाई :सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई॥आवत दीखि बरातिन्ह सीता। रूप रासि सब भाँति पुनीता॥1॥ भावार्थ:- सीताजी की सुंदरता का वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि बुद्धि बहुत छोटी है और मनोहरता बहुत बड़ी है। रूप की राशि…
चौपाई :समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए॥बेगि कुअँरि अब आनहु जाई। चले मुदित मुनि आयसु पाई॥1॥ भावार्थ:- समय देखकर वशिष्ठजी ने शतानंदजी को आदरपूर्वक बुलाया। वे सुनकर आदर के साथ आए। वशिष्ठजी ने कहा- अब जाकर राजकुमारी को…
चौपाई :बहुरि कीन्हि कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा॥कीन्हि जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई॥1॥ भावार्थ:- फिर उन्होंने कोसलाधीश राजा दशरथजी की पूजा उन्हें ईश (महादेवजी) के समान जानकर की, कोई दूसरा भाव न था।…
चौपाई :मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब रीतीं॥मिलत महा दोउ राज बिराजे। उपमा खोजि खोजि कबि लाजे॥1॥ भावार्थ:- वैदिक और लौकिक सब रीतियाँ करके जनकजी और दशरथजी बड़े प्रेम से मिले। दोनों महाराज मिलते हुए बड़े ही…
चौपाई :नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी॥बेद बिहित अरु कुल आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू॥1॥ भावार्थ:- मंगल अवसर जानकर नेत्रों के जल को रोके हुए रानी प्रसन्न मन से परछन कर रही हैं। वेदों में…
चौपाई :बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि॥पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा॥1॥ भावार्थ:- सभी स्त्रियाँ चन्द्रमुखी (चन्द्रमा के समान मुख वाली) और सभी मृगलोचनी (हरिण की सी आँखों वाली) हैं और सभी…
चौपाई :जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा॥संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे॥1॥ भावार्थ:- जिस श्रेष्ठ घोड़े पर श्री रामचन्द्रजी सवार हैं, उसका वर्णन सरस्वतीजी भी नहीं कर सकतीं। शंकरजी श्री रामचन्द्रजी के रूप…
चौपाई :केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा॥ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए॥1॥ भावार्थ:- रामजी का मोर के कंठ की सी कांतिवाला (हरिताभ) श्याम शरीर है। बिजली का अत्यन्त निरादर करने वाले प्रकाशमय सुंदर (पीत)…
चौपाई :जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं॥करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय रामु कहेउ कामारी॥1॥ भावार्थ:- जिनका नाम लेते ही जगत में सारे अमंगलों की जड़ कट जाती है और चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष)…
चौपाई :सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना॥सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा॥1॥ भावार्थ:- देवगण सुंदर मंगल का अवसर जानकर, नगाड़े बजा-बजाकर फूल बरसाते हैं। शिवजी, ब्रह्माजी आदि देववृन्द यूथ (टोलियाँ) बना-बनाकर विमानों पर जा चढ़े॥1॥ प्रेम…