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बालकांड दोहा 349

चौपाई :करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा॥भूषन मनि पट नाना जाती। करहिं निछावरि अगनित भाँती॥1॥ भावार्थ:- वे बार-बार आरती कर रही हैं। उस प्रेम और महान आनंद को कौन कह सकता है! अनेकों प्रकार के आभूषण, रत्न…

12 Mar 2023 • 183 • 2 min read
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बालकांड दोहा 348

चौपाई :मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर॥जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी॥1॥ भावार्थ:- मागध, सूत, भाट और चतुर नट तीनों लोकों के उजागर (सबको प्रकाश देने वाले परम प्रकाश स्वरूप) श्री…

12 Mar 2023 • 181 • 2 min read
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बालकांड दोहा 347

चौपाई :धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ॥सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँ बलाक अवलि मनु करषहिं॥1॥ भावार्थ:- धूप के धुएँ से आकाश ऐसा काला हो गया है मानो सावन के बादल घुमड़-घुमड़कर छा गए हों। देवता…

12 Mar 2023 • 197 • 2 min read
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बालकांड दोहा 346

चौपाई :मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता॥राम दरस हित अति अनुरागीं। परिछनि साजु सजन सब लागीं॥1॥ भावार्थ:- सुख और महान आनंद से विवश होने के कारण सब माताओं के शरीर शिथिल हो गए हैं, उनके…

12 Mar 2023 • 209 • 2 min read
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बालकांड दोहा 345

चौपाई :भूप भवनु तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा॥मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई॥1॥ भावार्थ:- उस समय राजमहल (अत्यन्त) शोभित हो रहा था। उसकी रचना देखकर कामदेव भी मन मोहित हो जाता था। मंगल शकुन, मनोहरता,…

12 Mar 2023 • 201 • 2 min read
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बालकांड दोहा 344

चौपाई :हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे॥झाँझि बिरव डिंडिमीं सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई॥1॥ भावार्थ:- नगाड़ों पर चोटें पड़ने लगीं, सुंदर ढोल बजने लगे। भेरी और शंख की बड़ी आवाज हो रही है, हाथी-घोड़े गरज…

12 Mar 2023 • 195 • 2 min read
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बालकांड दोहा 343

चौपाई :बार बार करि बिनय बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई॥जनक गहे कौसिक पद जाई। चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई॥1॥ भावार्थ:- जनकजी की बार-बार विनती और बड़ाई करके श्री रघुनाथजी सब भाइयों के साथ चले। जनकजी ने जाकर विश्वामित्रजी के…

12 Mar 2023 • 190 • 2 min read
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बालकांड दोहा 342

चौपाई :सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई॥होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कलप कोटिक भरि लेखा॥1॥ भावार्थ:- आपने मुझे सभी प्रकार से बड़ाई दी और अपना जन जानकर अपना लिया। यदि दस हजार सरस्वती और शेष…

12 Mar 2023 • 215 • 2 min read
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बालकांड दोहा 341

चौपाई :मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा॥सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता॥1॥ भावार्थ:- जनकजी ने मुनि मंडली को सिर नवाया और सभी से आशीर्वाद पाया। फिर आदर के साथ वे रूप, शील और…

12 Mar 2023 • 204 • 2 min read
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बालकांड दोहा 340

चौपाई :नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे॥भूषन बसन बाजि गज दीन्हे। प्रेम पोषि ठाढ़े सब कीन्हे॥1॥ भावार्थ:- राजा दशरथजी ने विनती करके प्रतिष्ठित जनों को लौटाया और आदर के साथ सब मँगनों को बुलवाया। उनको गहने-कपड़े, घोड़े-हाथी…

12 Mar 2023 • 180 • 2 min read
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बालकांड दोहा 339

चौपाई :बहुबिधि भूप सुता समुझाईं। नारिधरमु कुलरीति सिखाईं॥दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे॥1॥ भावार्थ:- राजा ने पुत्रियों को बहुत प्रकार से समझाया और उन्हें स्त्रियों का धर्म और कुल की रीति सिखाई। बहुत से दासी-दास दिए,…

12 Mar 2023 • 196 • 2 min read
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बालकांड दोहा 338

चौपाई :सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए॥ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही॥1॥ भावार्थ:- जानकी ने जिन तोता और मैना को पाल-पोसकर बड़ा किया था और सोने के पिंजड़ों में रखकर पढ़ाया था, वे व्याकुल होकर…

12 Mar 2023 • 177 • 2 min read