Kishkindha Kand

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किष्किंधाकांड दोहा 19

चौपाई :इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा॥निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा॥1॥ भावार्थ:- यहाँ (किष्किन्धा नगरी में) पवनकुमार श्री हनुमान्‌जी ने विचार किया कि सुग्रीव ने श्री रामजी के कार्य को भुला दिया। उन्होंने…

22 Apr 2023 • 80 • 2 min read
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किष्किंधाकांड दोहा 18

चौपाई :बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई॥एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालुह जीति निमिष महुँ आनौं॥1॥ भावार्थ:- वर्षा बीत गई, निर्मल शरद्ऋतु आ गई, परंतु हे तात! सीता की कोई खबर नहीं मिली। एक बार…

22 Apr 2023 • 92 • 2 min read
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किष्किंधाकांड दोहा 17

चौपाई :सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकऊ बाधा॥फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा॥1॥ भावार्थ:- जो मछलियाँ अथाह जल में हैं, वे सुखी हैं, जैसे श्री हरि के शरण में चले जाने पर…

22 Apr 2023 • 76 • 2 min read
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किष्किंधाकांड दोहा 16

चौपाई :बरषा बिगत सरद रितु आई। लछमन देखहु परम सुहाई॥फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥1॥ भावार्थ:- हे लक्ष्मण! देखो, वर्षा बीत गई और परम सुंदर शरद् ऋतु आ गई। फूले हुए कास से सारी पृथ्वी छा…

22 Apr 2023 • 71 • 2 min read
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किष्किंधाकांड दोहा 15

चौपाई :दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका॥1॥ भावार्थ:- चारों दिशाओं में मेंढकों की ध्वनि ऐसी सुहावनी लगती है, मानो विद्यार्थियों के समुदाय वेद पढ़ रहे हों। अनेकों…

22 Apr 2023 • 1 • 3 min read
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किष्किंधाकांड दोहा 14

चौपाई :घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥दामिनि दमक रह नघन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं॥1॥ भावार्थ:- आकाश में बादल घुमड़-घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं, प्रिया (सीताजी) के बिना मेरा मन डर रहा है।…

22 Apr 2023 • 77 • 2 min read
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किष्किंधाकांड दोहा 13

चौपाई :सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा॥कंद मूल फल पत्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए॥1॥ भावार्थ:- सुंदर वन फूला हुआ अत्यंत सुशोभित है। मधु के लोभ से भौंरों के समूह गुंजार कर रहे हैं।…

22 Apr 2023 • 92 • 2 min read
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किष्किंधाकांड दोहा 12

चौपाई :उमा राम सम हत जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं॥सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति॥1॥ भावार्थ:- हे पार्वती! जगत में श्री रामजी के समान हित करने वाला गुरु, पिता, माता, बंधु…

22 Apr 2023 • 92 • 2 min read
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किष्किंधाकांड दोहा 11

चौपाई :राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब व्याकुल धावा॥नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा॥1॥ भावार्थ:- श्री रामचंद्रजी ने बालि को अपने परम धाम भेज दिया। नगर के सब लोग व्याकुल होकर दौड़े। बालि की…

22 Apr 2023 • 78 • 2 min read
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किष्किंधाकांड दोहा 9

चौपाई :परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगे॥स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ॥1॥ भावार्थ:- बाण के लगते ही बालि व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, किंतु प्रभु श्री रामचंद्रजी को आगे…

22 Apr 2023 • 119 • 2 min read
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किष्किंधाकांड दोहा 8

चौपाई :अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी॥भिरे उभौ बाली अति तर्जा। मुठिका मारि महाधुनि गर्जा॥1॥ भावार्थ:- ऐसा कहकर वह महान्‌ अभिमानी बालि सुग्रीव को तिनके के समान जानकर चला। दोनों भिड़ गए। बालि ने सुग्रीव को बहुत…

22 Apr 2023 • 111 • 2 min read
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किष्किंधाकांड दोहा 7

चौपाई :जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥1॥ भावार्थ:- जो लोग मित्र के दुःख से दुःखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है।…

22 Apr 2023 • 87 • 5 min read