Aranyakand

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अरण्यकाण्ड दोहा 10

चौपाई :मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना॥मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक॥1॥ भावार्थ:- मुनि अगस्त्यजी के एक सुतीक्ष्ण नामक सुजान (ज्ञानी) शिष्य थे, उनकी भगवान में प्रीति थी। वे मन, वचन और…

20 Apr 2023 • 180 • 4 min read
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अरण्यकाण्ड दोहा 09

चौपाई :अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा॥ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ॥1॥ भावार्थ:- ऐसा कहकर शरभंगजी ने योगाग्नि से अपने शरीर को जला डाला और श्री रामजी की कृपा से वे…

20 Apr 2023 • 173 • 2 min read
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अरण्यकाण्ड दोहा 08

चौपाई :कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला॥जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा॥1॥ भावार्थ:- मुनि ने कहा- हे कृपालु रघुवीर! हे शंकरजी मन रूपी मानसरोवर के राजहंस! सुनिए, मैं ब्रह्मलोक को जा रहा था। (इतने…

20 Apr 2023 • 185 • 2 min read
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अरण्यकाण्ड दोहा 07

चौपाई :मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा॥आगें राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें॥1॥ भावार्थ:- मुनि के चरण कमलों में सिर नवाकर देवता, मनुष्य और मुनियों के स्वामी श्री रामजी वन…

20 Apr 2023 • 174 • 2 min read
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अरण्यकाण्ड दोहा 06

चौपाई :सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा॥तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना॥1॥ भावार्थ:- जानकीजी ने सुनकर परम सुख पाया और आदरपूर्वक उनके चरणों में सिर नवाया। तब कृपा की खान श्री रामजी…

20 Apr 2023 • 181 • 3 min read
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अरण्यकाण्ड दोहा 05

चौपाई :अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता॥रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई॥1॥ भावार्थ:- फिर परम शीलवती और विनम्र श्री सीताजी अनसूयाजी (आत्रिजी की पत्नी) के चरण पकड़कर उनसे मिलीं। ऋषि पत्नी के मन में बड़ा…

20 Apr 2023 • 191 • 4 min read
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अरण्यकाण्ड दोहा 4

छन्द :नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं॥भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं॥1॥ भावार्थ:- हे भक्त वत्सल! हे कृपालु! हे कोमल स्वभाव वाले! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निष्काम पुरुषों को अपना परमधाम देने वाले आपके चरण कमलों को मैं भजता हूँ॥1॥…

19 Apr 2023 • 185 • 3 min read
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अरण्यकाण्ड दोहा 3

चौपाई :रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना॥बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना॥1॥ भावार्थ : अमृत के समान (प्रिय) हैं। फिर (कुछ समय पश्चात) श्री रामजी ने मन में ऐसा अनुमान किया कि मुझे…

19 Apr 2023 • 207 • 2 min read
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अरण्यकाण्ड दोहा 02

चौपाई :प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा॥धरि निज रूप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं॥1॥ भावार्थ:- मंत्र से प्रेरित होकर वह ब्रह्मबाण दौड़ा। कौआ भयभीत होकर भाग चला। वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्र…

19 Apr 2023 • 143 • 3 min read
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अरण्यकाण्ड दोहा 01

चौपाई :पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई॥अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन॥1॥ भावार्थ:- पुरवासियों के और भरतजी के अनुपम और सुंदर प्रेम का मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार गान…

19 Apr 2023 • 212 • 2 min read
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अरण्यकाण्ड शूरूआत श्लोक

श्लोक : मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददंवैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्‌।मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शंकरंवंदे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्री रामभूपप्रियम्‌॥1॥ भावार्थ:- धर्म रूपी वृक्ष के मूल, विवेक रूपी समुद्र को आनंद देने वाले पूर्णचन्द्र, वैराग्य रूपी कमल के (विकसित करने वाले) सूर्य, पाप रूपी घोर अंधकार को…

19 Apr 2023 • 189 • 2 min read