अयोध्याकाण्ड दोहा 314
चौपाई :पुरजन परिजन प्रजा गोसाईं। सब सुचि सरस सनेहँ सगाईं॥राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू॥1॥ भावार्थ:- हे गोसाईं! आपके प्रेम और संबंध में अवधपुर वासी, कुटुम्बी और प्रजा सभी पवित्र और रस (आनंद) से…
चौपाई :पुरजन परिजन प्रजा गोसाईं। सब सुचि सरस सनेहँ सगाईं॥राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू॥1॥ भावार्थ:- हे गोसाईं! आपके प्रेम और संबंध में अवधपुर वासी, कुटुम्बी और प्रजा सभी पवित्र और रस (आनंद) से…
चौपाई :भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू॥भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं॥1॥ भावार्थ:- (अगले छठे दिन) सबेरे स्नान करके भरतजी, ब्राह्मण, राजा जनक और सारा समाज आ जुटा। आज सबको विदा करने के…
चौपाई :एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं॥पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा॥1॥ भावार्थ:- इस प्रकार भरतजी वन में फिर रहे हैं। उनके नियम और प्रेम को देखकर मुनि भी सकुचा…
चौपाई :कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती॥नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई॥1॥ भावार्थ:- प्रेमपूर्वक धर्म के इतिहास कहते वह रात सुख से बीत गई और सबेरा हो गया। भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई नित्यक्रिया…
चौपाई :भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई॥सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू॥1॥ भावार्थ:- भरतजी ने अत्रिमुनि की आज्ञा पाकर जल के सब पात्र रवाना कर दिए और छोटे भाई शत्रुघ्न, अत्रि मुनि तथा…
चौपाई :धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआईं॥मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू॥1॥ भावार्थ:- ‘भरतजी धन्य हैं, स्वामी श्री रामजी की जय हो!’ ऐसा कहते हुए देवता बलपूर्वक (अत्यधिक) हर्षित होने लगे। भरतजी के…
चौपाई :एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं॥कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई॥1॥ भावार्थ:- मेरे मन में एक और बड़ा मनोरथ है, जो भय और संकोच के कारण कहा नहीं जाता। (श्री रामचन्द्रजी ने…
चौपाई :सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअँ जनु सानी॥सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी॥1॥ भावार्थ:- श्री रघुनाथजी की वाणी सुनकर, जो मानो प्रेम रूपी समुद्र के (मंथन से निकले हुए) अमृत में सनी हुई थी,…
चौपाई :सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा॥मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू॥1॥ भावार्थ:- गुरुजी का प्रसाद (अनुग्रह) ही घर में और वन में समाज सहित तुम्हारा और हमारा रक्षक है। माता, पिता, गुरु और…
चौपाई :जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती॥समउ समाजु लाज गुरजन की। उदासीन हित अनहित मन की॥1॥ भावार्थ:- हे तात! तुम सूर्यकुल की रीति को, सत्यप्रतिज्ञ पिताजी की कीर्ति और प्रीति को, समय, समाज और गुरुजनों की लज्जा…
चौपाई :भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ॥कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को॥1॥ भावार्थ:- भरतजी के स्वभाव का वर्णन वेदों के लिए भी सुगम नहीं है। (अतः) मेरी तुच्छ बुद्धि…
चौपाई :कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे॥सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री॥1॥ भावार्थ:- कृपासिंधु श्री रामचन्द्रजी ने लोगों को अपने स्नेह और देवराज इन्द्र के भारी छल से दुःखी देखा। सभा, राजा…