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सुंदरकाण्ड दोहा 48

चौपाई :सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥1॥भावार्थ:- (श्री रामजी ने कहा-) हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे काकभुशुण्डि, शिवजी और पार्वतीजी भी जानती हैं।…

04 Mar 2023 • 340 • 2 min read
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सुंदरकाण्ड दोहा 47

चौपाई :तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥1॥भावार्थ:- लोभ, मोह, मत्सर (डाह), मद और मान आदि अनेकों दुष्ट तभी तक हृदय में बसते हैं, जब तक…

04 Mar 2023 • 312 • 2 min read
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सुंदरकाण्ड दोहा 46

चौपाई :अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥1॥भावार्थ:- प्रभु ने उन्हें ऐसा कहकर दंडवत्‌ करते देखा तो वे अत्यंत हर्षित होकर तुरंत उठे। विभीषणजी के दीन वचन…

04 Mar 2023 • 274 • 2 min read
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सुंदरकाण्ड दोहा 45

चौपाई :सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥1॥भावार्थ:- विभीषणजी को आदर सहित आगे करके वानर फिर वहाँ चले, जहाँ करुणा की खान श्री रघुनाथजी थे। नेत्रों को आनंद का दान…

04 Mar 2023 • 316 • 2 min read
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सुंदरकाण्ड दोहा 44

चौपाई :कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥1॥भावार्थ:- जिसे करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या लगी हो, शरण में आने पर मैं उसे भी नहींत्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख…

04 Mar 2023 • 312 • 2 min read
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सुंदरकाण्ड दोहा 43

चौपाई :ऐहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंदु एहिं पारा॥कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥1॥भावार्थ:- इस प्रकार प्रेमसहित विचार करते हुए वे शीघ्र ही समुद्र के इस पार (जिधर श्री रामचंद्रजी की सेना थी) आ गए।…

04 Mar 2023 • 240 • 2 min read
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सुंदरकाण्ड दोहा 42

चौपाई :अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयू हीन भए सब तबहीं॥साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥1॥भावार्थ:- ऐसा कहकर विभीषणजी ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गए। (उनकी मृत्यु निश्चित हो गई)। (शिवजी कहते हैं-)…

04 Mar 2023 • 240 • 2 min read
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सुंदरकाण्ड दोहा 41

चौपाई :बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहिं निकट मृत्यु अब आई॥1॥भावार्थ:- विभीषण ने पंडितों, पुराणों और वेदों द्वारा सम्मत (अनुमोदित) वाणी से नीति बखानकर कही। पर उसे सुनते ही रावण क्रोधित होकर…

04 Mar 2023 • 357 • 2 min read
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सुंदरकाण्ड दोहा 40

चौपाई :माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥1॥भावार्थ:- माल्यवान्‌ नाम का एक बहुत ही बुद्धिमान मंत्री था। उसने उन (विभीषण) के वचन सुनकर बहुत सुख माना (और…

04 Mar 2023 • 250 • 2 min read
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सुंदरकाण्ड दोहा 39

चौपाई :तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥1॥भावार्थ:- हे तात! राम मनुष्यों के ही राजा नहीं हैं। वे समस्त लोकों के स्वामी और काल के भी काल हैं। वे (संपूर्ण ऐश्वर्य,…

04 Mar 2023 • 303 • 2 min read
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सुंदरकाण्ड दोहा 38

चौपाई :सोइ रावन कहुँ बनी सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥1॥भावार्थ:- रावण के लिए भी वही सहायता (संयोग) आ बनी है। मंत्री उसे सुना-सुनाकर (मुँह पर) स्तुति करते हैं। (इसी समय) अवसर जानकर…

04 Mar 2023 • 259 • 2 min read
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सुंदरकाण्ड दोहा 37

चौपाई :श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥1॥भावार्थ:- मूर्ख और जगत प्रसिद्ध अभिमानी रावण कानों से उसकी वाणी सुनकर खूब हँसा (और बोला-) स्त्रियों का स्वभाव सचमुच…

04 Mar 2023 • 297 • 2 min read