Ayodhyakand

अयोध्याकाण्ड दोहा 271

चौपाई :

कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोकबस बौरा॥
जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू॥1॥

 

भावार्थ:- अयोध्यानाथ की गति (दशरथजी का मरण) सुनकर जनकपुर वासी सभी लोग शोकवश बावले हो गए (सुध-बुध भूल गए)। उस समय जिन्होंने विदेह को (शोकमग्न) देखा, उनमें से किसी को ऐसा न लगा कि उनका विदेह (देहाभिमानरहित) नाम सत्य है! (क्योंकि देहभिमान से शून्य पुरुष को शोक कैसा?)॥1॥

 

रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि॥
भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू॥2॥

 

भावार्थ:- रानी की कुचाल सुनकर राजा जनकजी को कुछ सूझ न पड़ा, जैसे मणि के बिना साँप को नहीं सूझता। फिर भरतजी को राज्य और श्री रामचन्द्रजी को वनवास सुनकर मिथिलेश्वर जनकजी के हृदय में बड़ा दुःख हुआ॥2॥

 

नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू॥
समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ॥3॥

 

भावार्थ:- राजा ने विद्वानों और मंत्रियों के समाज से पूछा कि विचारकर कहिए, आज (इस समय) क्या करना उचित है? अयोध्या की दशा समझकर और दोनों प्रकार से असमंजस जानकर ‘चलिए या रहिए?’ किसी ने कुछ नहीं कहा॥3॥

 

नृपहिं धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी॥
बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ॥4॥

 

भावार्थ:- (जब किसी ने कोई सम्मति नहीं दी) तब राजा ने धीरज धर हृदय में विचारकर चार चतुर गुप्तचर (जासूस) अयोध्या को भेजे (और उनसे कह दिया कि) तुम लोग (श्री रामजी के प्रति) भरतजी के सद्भाव (अच्छे भाव, प्रेम) या दुर्भाव (बुरा भाव, विरोध) का (यथार्थ) पता लगाकर जल्दी लौट आना, किसी को तुम्हारा पता न लगने पावे॥4॥

 

दोहा :

गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।
चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति॥271॥

 

भावार्थ:- गुप्तचर अवध को गए और भरतजी का ढंग जानकर और उनकी करनी देखकर, जैसे ही भरतजी चित्रकूट को चले, वे तिरहुत (मिथिला) को चल दिए॥271॥

You may also like

Ayodhyakand

अयोध्याकाण्ड दोहा 81

चौपाई :एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा॥गनपति गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई॥1॥ भावार्थ:- इस प्रकार श्री रामजी ने सबको समझाया और हर्षित होकर गुरुजी के चरणकमलों में सिर नवाया। फिर गणेशजी, पार्वतीजी और…

02 Apr 2023 • 154 • 2 min read
Ayodhyakand

अयोध्याकांड दोहा 50

चौपाई :अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू॥भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू॥1॥ भावार्थ:- हृदय में ऐसा विचार कर क्रोध छोड़ दो, शोक और कलंक की कोठी मत बनो। भरत को अवश्य युवराजपद दो,…

20 Mar 2023 • 167 • 3 min read
Ayodhyakand

अयोध्याकाण्ड दोहा 238

चौपाई :सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी॥करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई॥1॥ भावार्थ:- सखा के वचन सुनकर और वृक्षों को देखकर भरतजी के नेत्रों में जल उमड़ आया। दोनों भाई प्रणाम करते हुए चले।…

17 Apr 2023 • 136 • 2 min read